पर्सनल लॉ से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में बेंच गठन की मांग

पर्सनल लॉ से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में बेंच गठन की मांग

चीफ जस्टिस को लिखे लेटर में छह मामलों का जिक्र
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को इन मामलों के याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने लेटर लिखा है और कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में पहले से निकाह हलाला, बहुविवाह को बैन करने के लिए याचिाक दायर हो रखी है और मामला पहले से संवैधानिक बेंच को रेफर हो चुका है। साथ ही दूसरी याचिका में उन्होंने तलाक के लिए जेंडर रिलीजन न्यूट्रल ग्राउंड होना चाहिए। सभी धर्म के लोगों के लिए तलाक का एक ही तरह का ग्राउंड होना चाहिए। अभी अलग-अलग धर्म के लिए तलाक का ग्राउंड अलग है।

वहीं एक अन्य याचिका में कहा गया है कि गार्जियनशिप और गोद लेने की प्रक्रिया भी सभी धर्म का एक होना चाहिए। उपाध्याय ने लेटर में कहा है कि गुजारा भत्ता के लिए भी एक समान नियम तय होना चाहिए और सभी धर्म और समुदाय के लिए यह एक होना चाहिए। साथ ही उत्तराधिकार अधिनियम भी एक करना चाहिए। अभी उत्तराधिकार संबंधित कानून अलग-अलग है। सभी धर्म के लोगों के लिए शादी की उम्र एक होना चाहिए। यानी शादी की न्यूनतम उम्र एक हो। इन तमाम याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले से नोटिस जारी कर रखा है।

बेंच गठन की लगाई है गुहार
चीफ जस्टिस को लिखे लेटर में उपाध्याय ने कहा है कहा है कि सुप्रीम कोर्ट न्याय का मंदिर है और देश के हर नागरिक के लिए वह मंदिर की तरह है। सुप्रीम कोर्ट संविधान का कस्टोडियन है। साथ ही लोगों के मानवाधिकार और मौलिक अधिकार का रक्षक है। ऐसे में गुहार लगाई जाती है कि उक्त तमाम जनहित से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के लिए बेंच का गठन हो।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही जारी कर चुका है नोटिस
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में पिछले दिसंबर से लेकर अब तक पांच ऐसी अर्जियों पर नोटिस जारी कर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है जिनमें अलग-अलग यूनिफॉर्म सिविल कोड के तत्व हैं। मसलन, एक समान तलाक का ग्राउंड करने से लेकर गुजारा भत्ता और विरासत संबंधित अधिकार एक समान किए जाने के लिए अलग-अलग अर्जियां दाखिल की गई है। मौजूदा समय में अलग-अलग धर्म और लिंग के आधार पर अलग-अलग कानून है। तीसरी याचिका में कहा गया है कि गुजारा भत्ता और जीवन निर्वाह के लिए दी जाने वाली एक मुश्त राशि के मामले में एकरुपता वाला आधार होना जरूरी है। इसे धर्म और जेंडर के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। एक याचिका में कहा गया है कि देश भर के तमाम धर्मों के लिए एडॉप्शन एंड गार्जियशिप कानून एक जैसा जेंडर न्यूट्रल, रिलिजन न्यूट्रल बनाया जाए। विवाह की उम्र 21 साल किए जाने से संबंधित याचिका भी दाखिल की गई थी।

बहुविवाह मामला हो चुका है संवैधानिक बेंच को रेफर
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में अश्विनी उपाध्याय ने अर्जी दाखिल कर बहुविवाह और निकाह हलाला आदि को गैरसंवैधानिक घोषि़त करने की गुहार लगा रखी है और कहा है कि ये प्रथा संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता है। इस मामले में उनकी ओर से दाखिल अर्जी पर सुनवाई के दौरान 26 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को संवैधानिक बेंच रेफर कर दिया था। यानी निकाह हलाला और बहुविवाह, मुताह, मिस्सयार और शरीयत कोर्ट को चुनौती देने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक बेंच रेफर किया जा चुका है और संवैधानिक बेंच को मामले का परीक्षण करना है।

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