90 के दशक में कितना क्रूर था तालिबान राज, हिंदू-सिख महिलाओं से कैसे आते थे पेश

90 के दशक में कितना क्रूर था तालिबान राज, हिंदू-सिख महिलाओं से कैसे आते थे पेश

तालिबान फिर अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो रहे हैं. लगभग सारे अफगानिस्तान पर उनका कब्जा हो चुका है. कुछ थोड़े से हिस्सों को छोड़ दें तो तालिबान के लड़ाकों ने बहुत तेजी से पहले अफगानिस्तान के तमाम प्रांतों की राजधानियों पर कब्जा और फिर काबुल आ पहुंचे. हालांकि जो खबरें आ रही हैं, वो ये कह रही हैं कि अफगानिस्तान के कई प्रांतों में तालिबान ने बड़े पैमाने पर खूनी खेल खेला है. लोग डरे हुए हैं.

तालिबान की स्थापना एक छोटे से गुट ने 1994 में की थी. लेकिन उसके बाद इसकी ताकत बढ़ती गई. 1994 के बाद उसके लड़ाके अफगानिस्तान में तेजी से अपनी गतिविधियों में लग गए. समय के साथ उनकी ताकत बढ़ने लगी. उनके लड़ाकों की तादाद भी खासी बढ़ने लगी. उनके पास हथियार और पैसे आने लगे. 1996 में उन्होंने पहली अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लिया.

तालिबान ने उसके बाद बहुत कड़ाई के साथ जिस तरह पूरे देश में इस्लामी कानून शरिया को लागू किया, उसकी अंतरराष्ट्रीय जगत में आलोचना भी होने लगी. वो इसे लागू करने के क्रूर तरीके अपनाने से भी बाज नहीं आते थे. लोगों को पाशविक तरीके से प्रताड़ित किया जाता था.

1997 मजबूती से जम गए तालिबान
1997 तक अफगानिस्तान में तालिबान की जडे़ं गहरी जम गईं. चाहे देशी हो या फिर विदेशी-हर किसी को तालिबान द्वारा तय सख़्त मानकों के हिसाब से रहना होता था. तालिबान में ऊपर से लेकर नीचे तक के लोगों की पढ़ाई लिखाई आमतौर पर मदरसों तक ही सीमित थी.

तालिबान राज में अफगानिस्तान में 05 सालों में 15 बड़े नरसंहार हुए. हजारों-लाखों को दरबदर कर दिया गया. अल्पसंख्यकों की शामत आ गई.

अजीबोगरीब कानून लागू किए गए
तालिबान ने उस समय कई अजीब कानून लागू किए. जिसमें पुरुषों के लिए दाढ़ी रखना अनिवार्य कर दिया गया. महिलाओं का बाहर निकलना, नौकरी करना सख्त तौर पर बंद कर दिया गया. स्कूल कालेजों पर पाबंदी लगा दी गई. संगीत, कबूतर और पतंगबाज़ी पर रोक लग गई. अगर कोई महिला बगैर बुर्का बाहर नजर आ गई तो उसे सजा ए मौत की सजा तय हो जाती थी.

महिलाओं पर ज्यादा आफत
उन दिनों तालिबान के शासन में महिलाओं की आफत ज्यादा थी. उनकी शिक्षा और नौकरियों पर तो पाबंदी लगी ही. साथ ही अगर उन्हें कहीं निकलना भी होता था तो वो अकेले नहीं जा सकती थीं. उन्हें अपने साथ किसी पुरुष को जरूर साथ लेना पड़ता था. महिलाओं के खेलों पर पूरी तरह पाबंदी लग चुकी थी. अगर किसी महिला को किसी बात के उल्लंघन के लिए पकड़ लिया गया तो फिर उसे सरेआम कड़ी इस्लामी सजाएं मिलती थीं.

तब अफगानिस्तान से महिलाओं को भरे बाज़ार में पत्थरों से मारने और निक्कर पहनने पर फ़ुटबॉल टीम का सिर मूंडने. संगीत और शोबिज़ से संबंध रखने वाले लोगों को सज़ाएं देने की ख़बरें बाहर आने लगीं.

05 सालों में 15 बड़े नरसंहार
तालिबान आतंक और ज्यादतियों को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने बाद 55 पेज की एक रिपोर्ट प्रकाशित की. उसमें कहा गया कि किस तरह अफगानिस्तान के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों पर नियंत्रण करने के लिए तालिबान ने अपने ही लोगों का कत्लेआम किया. रिपोर्ट के अनुसार 1996 से लेकर 2001 के बीच वहां 15 बडे़ नरसंहार हुए. ये कत्लेआम रक्षा मंत्रालय या फिर खुद मुल्ला उमर के जरिए करवाया जाता था.

सबसे ज्यादा आफत महिलाओं की आई. उन पर सबसे ज्यादा पाबंदियां लगा दी गईं. हिंदू और सिख महिलाओं से खासतौर पर कहा गया कि वो सार्वजनिक तौर पर जब भी निकलेंगी तो पीली ड्रेस पहनकर निकलेंगी.

अलकायदा भी करता था कत्लेआम
दस्तावेज ये भी बताते हैं कि इस कत्लेआम में पाकिस्तान और अरब लड़ाके भी शामिल होते थे. उस समय ओसामा बिन लादेन ने अफगानिस्तान में कुख्यात 055 बिग्रेड बनाई हुई थी. जिसने अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर कई कत्लेआम किए. रिपोर्ट कहती है कि प्रत्यक्षदर्शी गांववालों ने बताया कि ये अरब लड़ाके बड़े बड़े चाकू लेकर आते थे और उससे गला काट देते थे. बेहरमी से लोगों की खालें भी खींच ली जाती थीं. बाद में कई तालिबानी नेताओं ने इस क्रूर रवैये को सही भी ठहराया.

1998 में जब संयुक्त राष्ट्र ने अफगानिस्तान के भूखमरी का जीवन बिता रहे करीब 1.6 लाख लोगों के लिए भोजन भेजा तो तालिबना ने उसे लेने से मना कर दिया. तब संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि अपने राजनीतिक सोचे समझे एजेंडे पर तालिबान देश के बहुत से लोगों को भूखा मार रहा है.

इसके बाद अक्सर लोगों पर तालिबान द्वारा गोलियां चलाकर मारने, महिलाओं से बलात्कार करने, हजारों लोगों को कंटेनर में बंद करके मरने के लिए छोड़ देने की भी खबरें आईं.

बामियान में बुद्ध की प्रतिमाएं तोड़ीं
1999 में बामियान में बुद्ध की प्रतिमाएं तोड़ दी गईं. बड़े पैमाने पर आदमी, औरतों और बच्चों को देश से निकल दिया गया. पॉटरी के कामों के प्रसिद्ध 45 हजार लोगों की आबादी वाले कस्बे इस्तालिफ में लोगों से कहा गया कि वो 24 घंटे के अंदर पूरी तरह से इस जगह को खाली कर दें. इस तरह हर जगह से हजारों लोग दरबदर कर दिए गए.

ह्यूमन ट्रैफिकिंग
कई तालिबान और अल कायदा ह्यूमन ट्रैफिकिंग का नेटवर्क संचालित करते थे. अल्पसंख्यक महिलाओं को गुलाम बनाकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में बेचा जाने लगा. इसमें अफगानिस्तान में ताजिक, उज्बेक, हजारा और गैर पश्तून महिलाएं उनका निशाना बनीं. ऐसे में हजारों महिलाओं ने दासता की जगह खुदकुशी कर लेना बेहतर समझा. बड़े पैमाने पर महिलाओं का अपहरण कर लिया जाता था. उन्हें बसों और ट्रकों में भरकर ले जाया जाता था

नागरिकों के खिलाफ हिंसा
संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट कहती है कि तालिबान और उसके सहयोगी अफगानिस्तान में वर्ष 2009 में हुई हिंसा के लिए आमतौर पर जिम्मेदार रहे. 76 फीसदी वारदातें उनके जरिए की गईं. 2010 में ये तादाद 80 फीसदी तक पहुंच गई.

हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार
अफगानिस्तान में हिंदुओं और सिखों की आबादी बहुत प्राचीन समय से रहती आई है. वो वहां के महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक रहे हैं. देश के विकास और व्यापार में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है. लेकिन तालिबान के शासन में आने के बाद उनका पलायन तेजी से भारत और दूसरे देशों की ओर हुआ.

तालिबान ने उन्हें सख्त तौर पर शरिया कानून का पालन करने की हिदायत दी. उन्होंने उनकी संपत्तियों पर कब्जा किया. धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाया. तालिबान राज में गैर मुस्लिम परिवारों के लिए सख्त हिदायत थी कि वो अपने मकानों के बाहर पीले रंग का बोर्ड लगाएंगे और गैर मुस्लिम महिलाएं पीले रंग की ड्रेस पहनेंगी.

आमतौर पर हिंदू और सिख महिलाओं को खास मार्क वाले पीले रंग के कपड़े इसलिए पहनाए जाते थे कि वो अलग से पहचान में आ जाएं. उन्हें ये भी ताकीद रहती थी कि वो मुस्लिमों से एक फासले पर चलें. उनके साथ बातचीत या मेलजोल नहीं करें. यहां तक कि हिंदू और सिख धर्म की महिलाओं को मुस्लिमों के घर जाने और उनके यहां किसी मुस्लिम के आने पर भी पाबंदी रहती थी.

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