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'चार दिन की जिंद‍गी में बिहारियों के लिए सारे दिन छठ के ही हैं'

‘कांचही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…।’ भोजपुरी लोक गीतों की स्वर कोकिला शारदा सिन्हा की सुपरिचित आवाज में यह गीत कानों तक पहुंचते ही मन में आस्था और अपनेपन की खुशबू घुलने लगती है और प्रवासी मन हर हाल में अपने घर पहुंचने को मचल उठता है। रोजी-रोटी के सवाल हल करने के लिए हजारों-हजार मील दूर गए प्रवासियों की पीड़ा मुखर हो उठती है। यह गीत अंतरात्मा के हर मलिन घाट को धोकर निर्मल कर देता है। छठ में अपनों से दूर होने की पीड़ा को सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

छठ, यानी उस सामाजिक समरसता को सहेजने वाला एक महापर्व जिसके लिए एक पूरे राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गरिमा को रौंद दिया गया। किसी भी बिहारी के लिए इससे अधिक वेदना कुछ और नहीं हो सकती कि माई, बाबूजी, भाभी और बड़की माई जैसे तमाम रिश्तों से दूर रह कर छठ को टेलिविजन, फेसबुक और यूट्यब पर जीना पड़े। बहुतों के लिए तो छठ का मतलब सिर्फ ठेकुआ का प्रसाद है। लेकिन हमारे लिए तो छठ के मायने कहीं ज्यादा बड़े हैं।

गांव में दुल्हन की तरह सजे छठ घाट पर सामूहिकता का अहसास और उसकी यादें परदेस में भी आंखों में चमकती रहती हैं। जिन लोगों को अपने ऑफिस से छठ के लिए छुट्टी मिल जाती है, उनका मन नाच उठता है। जिनको छुट्टी नहीं मिल पाती, वे मायूस हो जाते हैं। आंखें आंसुओं को छिपाने की कोशिश करती हैं। कुछ लोग कहते हैं कि टिकट कन्फर्म नहीं हुआ, अगले साल पक्का जाएंगे। माई का फोन आया था। कह रही थीं कि बाबू एहू बेरी छठ पर नहीं आए। तुम्हरे बिन छठ पर कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। अइसा नौकरी काहे करते हो, जहां छठ पर छुट्टी न मिले। कहती हैं कि नौकरियो त छठिए माई के दिहल है।

जो लोग छठ पर अपने गांव नहीं पहुंच पाते, वे दिवाली के दिन से छठ तक सिर्फ यूट्यूब पर शारदा सिन्हा के गाने सुनते हैं। उनके आंसुओं को उनके अपने भी गांव में महसूस करते हैं। छठ के गीत हजारों हजार तमाम गायकों ने गाए, लेकिन चार दशक पहले शारदा सिन्हा के गाए चंद गीत इतने लोकप्रिय हुए कि शारदा सिन्हा खुद छठ की संस्कृति की पर्यायवाची जान पड़ती हैं। उनकी आवाज में जितनी मासूमियत है, उतनी ही छठ की पवित्रता।

छठ आदिम उत्सव का प्रतीक है। छठ में न कोई पुरोहित होता है और न ही कोई यजमान। कई जातियों में बंटे समाज का एक ही घाट होता है। यहां होते हैं तो सिर्फ व्रती और श्रद्धालु। छठ पर ऐसे किसी देवी-देवता की पूजा नहीं होती, जिसे हम अपनी आंखों से देख न सकें। इस व्रत में पूजा होती है, प्रकृति के प्रत्यक्ष देव अक्षय ऊर्जा के स्रोत भगवान भुवन भास्कर की, नदियों- जलाशयों की और वनस्पतियों की, जिनके बिना हमारा जीवन ही संभव नहीं। व्रत करने वाली महिलाएं शाम के समय इस उम्मीद के साथ सूर्य को अर्घ्य देती हैं कि हे दीनानाथ, अगली सुबह हमारी जिंदगी में नई ऊर्जा और रोशनी लेकर आना।

भोजपुरी के साहित्यकार मनोज भावुक का कहना है कि छठ के गीत बहुत बेचैन करते हैं। कुछ उसी तरह, जैसे गाय के रंभाने पर बछड़ा बेचैन हो जाता है। तभी तो छठ में प्रवासी बिहारी दिल्ली-मुंबई से ट्रेनों में लटककर गांव की ओर भागते हैं और जो नहीं आ पाते, वे शहर में ही गांव गढ़ लेते हैं। वह कहते हैं कि 2005 में जब मैं युगांडा में था, तो हमने भोजपुरी एसोसिएशन ऑफ युगांडा की स्थापना की और विक्टोरिया लेक के किनारे छठ पूजा हुई। उसी तरह 2006 में भोजपुरी समाज बनाकर लंदन में पूजा की गई। जब टेलीविजन से जुड़ा तो छठ पर कई शो बनाए। छठ में हम हैं, हमारी जड़े हैं और हमारी मांएं हैं।

युवा कवि अभिषेक वत्स कहते हैं कि जिंदगी अगर चार दिनों की है, तो चार दिन हम बिहारियों के लिए छठ के ही हैं। बिहार के रहने वाले लोगों से गांव, घर, खेत, कस्बा, होमटाउन सब छूट जाता है, लेकिन नहीं छूटता है तो छठ का व्रत। इसने पूरी दुनिया में बसे बिहारियों को अपनी मिट्टी से जोड़े रखा है। चाहे जो कहिए, छठ ही असल बिहारीपन है।