काशी विश्वनाथ धाम से सटी ज्ञानवापी मस्जिद पर आखिर क्या है विवाद?

हाइलाइट्स

  • काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण कर रहे पीएम मोदी
  • मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद भी पुराना
  • दावा है कि मंदिर को तोड़कर बनाई गई ज्ञानवापी मस्जिद, नीचे आज भी मौजूद शिवलिंग
  • 250 साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था मंदिर का निर्माण

वाराणसी
काशी विश्‍वनाथ धाम की सूरत बदल गई है। अब गंगा किनारे वाराणसी के पुराने घाटों से सीधे बाबा विश्‍वनाथ तक पहुंचा जा सकेगा। सात तरह के पत्‍थरों से विश्‍वनाथ धाम को सजाया गया है। यहां आने वाले श्रद्धालु रुद्र वन यानी रुद्राक्ष के पेड़ों के बीच से होकर बाबा विश्‍वनाथ का दर्शन करने पहुंचेंगे। काशी विश्‍वनाथ धाम कॉरिडोर 50 हजार वर्गमीटर में बना है। विश्वनाथ धाम परिसर बनाने के लिए ज्ञानवापी मस्जिद की 1700 फीट जमीन ली गई। हालांकि हिंदू दावा करते हैं कि ज्ञानवापी मस्जिद की पूरी जमीन मंदिर की है।

उत्तर प्रदेश के अयोध्या के बाद वाराणसी जिले के काशी विश्वनाथ परिसर में स्थित ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर कई बार खींचतान शुरू हुई। ज्ञानवापी को लेकर हिन्दू पक्ष की ओर से ये दावा किया जाता है कि विवादित ढांचे के फर्श के नीचे 100 फीट ऊंचा आदि विशेश्वर का स्वयम्भू ज्योतिर्लिंग स्थापित है। यही नहीं विवादित ढांचे के दीवारों पर देवी देवताओं के चित्र भी प्रदर्शित है।

250 साल पुराना मंदिर होने के सबूत

दावा किया जाता है कि मंदिर का निर्माण लगभग 250 साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था। यहां पर लोग पूजा करते थे। विवादित स्थल के भूतल में तहखाना और मस्जिद के गुम्बद के पीछे प्राचीन मंदिर की दीवार का दावा किया जाता है। ज्ञानवापी मस्जिद के बाहर विशालकाय नंदी हैं, जिसका मुख मस्जिद की ओर है। इसके अलावा मस्जिद की दीवारों पर नक्काशियों से देवी देवताओं के चित्र उकेरे गए हैं। स्कंद पुराण में भी इन बातों का वर्णन है।

1664 में किया गया नष्ट
कहा जाता है कि काशी विश्वनाथ मंदिर को औरंगजेब ने 1664 में इसे नष्ट कर दिया था और इसके अवशेषों का उपयोग मस्जिद बनाने के लिए किया, जिसे मंदिर की भूमि के एक हिस्से पर ज्ञानवापसी मस्जिद के रूप में जाना जाता है।

1991 में दाखिल हुआ था पहला केस
काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी केस में 1991 में वाराणसी कोर्ट में मुकदमा दाखिल हुआ था। इस याचिका कि जरिए ज्ञानवापी में पूजा की अनुमति मांगी गई थी। प्राचीन मूर्ति स्वयंभू लार्ड विशेश्वर की ओर से सोमनाथ व्यास,रामरंग शर्मा और हरिहर पांडेय बतौर वादी इसमें शामिल हैं। मुकदमा दाखिल होने के कुछ दिनों बाद ही मस्जिद कमिटी ने केंद्र सरकार की ओर से बनाए गए प्लेसेज ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रॉविजन) ऐक्ट, 1991 का हवाला देकर हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साल 1993 में स्टे लगाकर यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया था।

2019 से शुरू हुई सुनवाई
स्टे ऑर्डर की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद साल 2019 में वाराणसी कोर्ट में फिर से इस मामले में सुनवाई शुरू हुई। तारीख दर तारीख सुनवाई के बाद 8 अप्रैल 2021 को वाराणसी की सिविल जज सीनियर डिविजन फास्ट ट्रैक कोर्ट से ज्ञानवापी मस्जिद के पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंजूरी दी है।

हिस्ट्री ऑफ बनारस का जिक्र

बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डा. एएस ऑल्टेकर ने 'हिस्ट्री ऑफ बनारस' किताब लिखी है। इस किताब में उन्होंने प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग द्वारा किए गए विश्वनाथ मंदिर के लिंग का जिक्र किया है। किताब में बताया गया है कि विश्वनाथ का शिवलिंग 100 फीट ऊंचा था और उसके ऊपर लगातार गंगा की धारा गिरती थी। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने वाराणसी को धार्मिक, शैक्षणिक एवं कलात्मक गतिविधियों का केन्द्र बताया है और इसका विस्तार गंगा नदी के किनारे 5 किलोमीटर तक लिखा है।

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