असम में जगहों के नाम बदलेंगे CM हिमंत, बनेगा पोर्टल...जानें क्या है तैयारी

हाइलाइट्स

  • यूपी में योगी आदित्यनाथ बदल चुके हैं जिलों के नाम
  • अब असम के सीएम हिमंत बिस्व सरमा जगहों के नाम बदलने की दिशा में
  • सरकार बनाने जा रही पोर्टल, लोगों से मांगेगी राय
  • कई इलाकों के नाम को लेकर उठ रही आपत्ति, उन जगहों के बदलेंगे नाम

गुवाहाटी: शेक्सपियर के एक मशहूर ड्रामे में रोमियो ने जूलिएट से भले ही यह कहा हो कि 'नाम में क्या रखा है?' लेकिन अभी पांच रोज पहले असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (Himanta Biswa sarma) ने एक ट्वीट कर कहा कि 'नाम में बहुत कुछ है।' दरअसल, उनके इस ट्वीट की पृष्ठभूमि यह है कि असम सरकार (Assam government portal) एक पोर्टल बनाने जा रही है, जिसके जरिए वह असम (Assam) के लोगों से सुझाव मांगेगी कि राज्य के किन स्थानों के नाम बदल दिए जाने चाहिए? पोर्टल बनाने और राज्य की जनता से सुझाव मांगने की जो यह कवायद है, वह यह बताने के लिए काफी है कि असम (Assam name change issue) में आने वाले दिनों में बड़े पैमाने पर नाम बदले जाएंगे।

सीएम हिमंत ने नाम बदलने वाले फैसले से जोड़कर जो दो बातें और कहीं हैं। अगर उनके निहितार्थ को समझा जाए तो यह यकीनी तौर पर कहा जा सकता है कि आने कुछ महीने असम की सियासी तपिश को बढ़ाने वाले साबित हो सकते हैं। एक बात तो उन्होंने यह कही कि जो नाम हमारी संस्कृति के विपरीत हैं, उन नामों को किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं किया जा सकता। दूसरा काला पहाड़ का नाम बदलने का भी जिक्र किया।

काला पहाड़ का मतलब
काला पहाड़ को लेकर कहा जाता है कि उसका का नाम बंगाल सल्तनत के एक ऐसे सेनापति के नाम पर है, जिनके आदेश के तहत कामाख्या मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया था। सीएम के इस ऐलान के बाद से ही विवाद शुरू हो गया है। राज्य की जो विरोधी पार्टियां हैं, उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया है कि वह अपनी नाकामी छिपाने के लिए इस तरह के दुष्प्रचार को जानबूझकर खड़ा कर रहे हैं।

हिमंत का सेक्युलर चेहरा ऐसे बदला
हिमंत बिस्व सरमा का राजनीतिक सफर कांग्रेस से शुरू हुआ है। वह कांग्रेस के टिकट पर पहली बार 2001 में विधायक बने थे। लगातार तीन बार कांग्रेस के ही टिकट पर जीते। इस दरम्यान वह राज्य की कांग्रेस सरकारों में अहम मंत्रालयों के मंत्री भी हुए। कांग्रेस में रहने के दौरान उनकी पहचान एक 'सेक्युलर' चेहरे के रूप में होती रही लेकिन नेतृत्व के साथ उनके टकराव की शुरुआत 2016 के चुनाव में नेतृत्व के सवाल पर हुई। सरमा चाहते थे कि 2016 में कांग्रेस उन्हें सीएम चेहरा बनाए। बात नहीं बनी तो वह बीजेपी में चले गए।

हिंदुत्व का झंडा लेकर बढ़े आगे
2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने असम में पहली बार सत्ता पाने में कामयाबी पाई थी, जिसका श्रेय हिमंत को ही गया लेकिन सीएम पद उनके हाथ नहीं आया। 2021 में जब पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में आई तो उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाया गया। उसके बाद से हिमंत अपनी छवि हिंदुत्व के झंडाबरदार के रूप में मजबूत करना चाहते हैं। सीएम बनते ही उन्होंने कानून लाकर हिंदू, जैन, सिख और गोमांस नहीं खाने वाले समुदाय के रहने वाले इलाकों में गोमांस का व्यापार बैन कर दिया। मंदिरों के पांच किलोमीटर के दायरे में भी इस व्यापार पर प्रतिबंध लगा रखा गया है। इसी तरह उनकी सरकार धर्म बदलने और अंतरधार्मिक विवाह पर भी कड़ा कानून ला चुकी है।

राज्य में राजीव गांधी राष्ट्रीय पार्क का नाम भी उन्होंने बदल दिया। असम जातीय परिषद के नेता जगदीश भुइयां कहते हैं, 'हिमंत जो कर रहे हैं, बीजेपी के अंदर अपने को बनाए रखने की एक तरह से जंग हैं। उन्हें पता है कि कट्टरवादी नेता बनकर ही बीजेपी में अपनी जगह बनाई जा सकती है, वरना उन्हें मूल बीजेपी के लोग बाहर का रास्ता दिखा देंगे।'

खुद हिमंत क्या कहते हैं?
हिमंत कहते हैं कि उनके मुख्यमंत्रित्व काल में राज्य सरकार ने जो भी फैसले लिए हैं, वह किसी जाति या मजहब के खिलाफ नहीं बल्कि भारतीयता के अनुरूप हैं। राज्य के स्थानों के नाम बदलने वाले फैसले को लेकर भी वह कहते हैं कि हम अपनी तरफ से कोई फैसला नहीं लेने जा रहे। हमने यह फैसला जनता पर छोड़ दिया है। वे बताएं कि किन स्थानों के मौजूदा नामों से वह सहमत नहीं है। जनता जिन भी स्थानों के नाम पर अपनी आपत्ति दर्ज कराएगी, हम उसे बदल देंगे। हमारा साफ मत है कि राज्य के स्थानों के नाम हमारी अपनी संस्कृति के अनुरूप होने चाहिए। पूर्व में नाम किन परिस्थितियों पर रखे गए, वह अतीत की बात है, ऐसा तो है नहीं कि उसे बदला नहीं जा सकता।

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