सोनिया और राहुल को आखिर प्रशांत किशोर में जादूगर क्यों दिखाई दे रहा है?

हाइलाइट्स

  • 2024 में वापसी के लिए बेचैन कांग्रेस को प्रशांत किशोर में ही 'जादूगर' दिखने लगा है
  • रिश्तों की खटास दरकिनार कर कांग्रेस और प्रशांत किशोर फिर एक टेबल पर आए हैं
  • एक वक्त था जब पार्टी के अंदर नेताओं का एक बड़ा तबका उन्हें कतई पसंद नहीं करता था

नई दिल्ली : प्रशांत किशोर कांग्रेस में आएंगे या नहीं? पिछले कई महीनों से चल रही अटकलें लगभग खत्म होने की ओर बढ़ गई हैं। हालांकि अंतिम तौर पर उस वक्त तक कुछ नहीं कहा जा सकता है जब तक प्रशांत किशोर औपचारिक रूप से कांग्रेस में शामिल नहीं हो जाते हैं। पिछले साल भी कांग्रेस और प्रशांत किशोर के बीच बात बनते-बनते बिगड़ गई थी। मुलाकात और बैठकों के दौर के बीच कांग्रेस आलाकमान को अहसास हुआ कि पार्टी के कई बड़े चेहरों को दूसरी पार्टी में शामिल कराने में प्रशांत किशोर ने मध्यस्थता की है तो रिश्तों में खटास आ गई।

बात यहां तक बिगड़ी कि प्रशांत किशोर ने ट्वीट कर कांग्रेस पर निशाना साधा।उन्होंने कहा, ‘जिस विचारधारा और राजनीति का कांग्रेस प्रतिनिधित्व करती है, वह मजबूत विपक्ष के लिए अहम है, लेकिन कांग्रेस का नेतृत्व किसी एक व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकारी नहीं है। विशेषकर तब जब पार्टी पिछले 10 साल में 90 प्रतिशत चुनाव हारी है। विपक्ष के नेतृत्व का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से होने दीजिए।’ राहुल पर कोई निशाना साधे और कांग्रेस चुप रहे, ऐसा मुमकिन ही नहीं था।

 

कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा की तरफ से कहीं ज्यादा तल्ख जवाब आया। उन्होंने कहा था, ‘कोई वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं रखने वाला एक पेशेवर राजनीतिक दलों- व्यक्तियों को चुनाव लड़ने के बारे में सलाह देने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन वह हमारी राजनीति का एजेंडा निर्धारित नहीं कर सकता।' उसके बाद मीडिया को दिए गए अपने कई इंटरव्यू में प्रशांत किशोर नरेंद्र मोदी की तारीफ करते दिखे। कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि उन्होंने कोई मौका नहीं गंवाया। केवल ट्वीट और कैंडल मार्च के जरिए आप बीजेपी को हरा नहीं सकते। इसके बाद ऐसा लगा था कि कांग्रेस और प्रशांत किशोर का 'चैप्टर' हमेशा के लिए बंद हो गया है।

sonia-rahul

प्रशांत किशोर क्या कांग्रेस को 2024 के लिए जीत का मंत्र दे पाएंगे?

कांग्रेस के लिए कैसे जरूरत बने
रिश्तों की तमाम खटास को दरकिनार कर कांग्रेस और प्रशांत किशोर फिर एक टेबल पर आए हैं। पिछला पूरा हफ्ता एक दूसरे को समझने और बैठकों के नाम रहा है। इस बीच कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली का बयान आया कि प्रशांत किशोर को पार्टी में शामिल कराने के लिए सोनिया गांधी कुछ महीने पहले ही बहुत उत्साहित थीं लेकिन कुछ कारणों से ऐसा संभव नहीं हो पाया था। हालांकि एक वक्त था जब पार्टी के अंदर नेताओं का एक बड़ा तबका उन्हें कतई पसंद नहीं करता था। 2017 के यूपी के विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें अपना रणनीतिकार बनाया था तब पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ बोलचाल तक नहीं होती थी। प्रशांत किशोर अपने काम में किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं चाहते थे तो कांग्रेस में उनकी एंटी लॉबी को लगता था कि बाहरी कोई शख्स पार्टी के अंदर उनके एकाधिकार को चुनौती कैसे दे सकता है? लेकिन स्थितियां बदल गई हैं और अब ज्यादातर नेता चाहते हैं कि प्रशांत किशोर किसी भी तरह 2024 के लिए चुनावी कमान संभाल लें।

अगर 2024 में पार्टी अपनी वापसी नहीं कर पाई तो लगातार तीन लोकसभा चुनाव की हार से उसका संकट बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा। ऐसे में उन्हें प्रशांत किशोर में ही 'जादूगर' दिखने लगा है। प्रशांत किशोर के कई गैर बीजेपी दलों के नेताओं के साथ बहुत अच्छे रिश्ते हैं, जिसके जरिए कांग्रेस के नेतृत्व में महागठजोड़ बनने में भी मदद मिल सकती है। अभी कांग्रेस अपने स्तर से विपक्ष को गोलबंद करने में नाकाम साबित हो रही है। कांग्रेस में एक बड़ी समस्या यह भी देखी जा रही है कि पार्टी में अब ऐसे 'फुल टाइमर' नेताओं का अभाव हो गया है जो देश की नब्ज को समझते हुए उसके अनुरूप पार्टी की रणनीति बनाते रहें। पार्टी अब गुटों में बंट गई और नेताओं का ज्यादा वक्त ट्विटर के जरिए राजनीति करने में बीत रहा है। ऐसे में वह प्रशांत किशोर जैसे शख्स की सख्त जरूरत हो गई है।

प्रशांत की भी जरूरत
कहा जाता है कि कांग्रेस को अगर प्रशांत किशोर की जरूरत है तो प्रशांत किशोर को भी कांग्रेस की जरूरत है। प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार के रूप में काफी सफल रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए 'चाय पे चर्चा' और 'थ्री-डी नरेंद्र मोदी' का कॉन्सेप्ट प्रशांत किशोर का ही था, जिसने भारतीय चुनाव प्रचार को एक नई दिशा दी। इसके बाद उन्हें अपने साथ लेने की क्षेत्रीय दलों में होड़ देखी गई। 2015 के बिहार चुनाव में नीतीश कुमार से लेकर वह आम आदमी पार्टी, आंध्र प्रदेश में जगन रेड्डी और तमिलनाडु में डीएमके नेता एमके स्टालिन, पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह (2017 में) और तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी अपनी प्रोफेशनल सेवाएं दे चुके हैं, जिसमें सभी में वह कामयाब रहे। 2021 का बंगाल चुनाव उनके लिए सबसे ज्यादा प्रतिष्ठापूर्ण था, जिसमें उन्होंने खुद को साबित करके दिखाया। हालांकि 2017 में यूपी में उनकी नाकामयाबी भी उनके करियर के साथ जुड़ी हुई है। प्रशांत किशोर अब चुनावी रणनीतिकार के बजाय राजनीति में अपने हाथ आजमाना चाहते हैं। क्षेत्रीय दलों के जरिए उन्हें उतना स्पेस नहीं मिल पा रहा है, जितना वह चाहते हैं। बीजेपी में उनके लिए नेता के तौर पर हाथ आजमाने को जगह मिलना आसान नहीं है। कांग्रेस ही उनके लिए बेहतर विकल्प दिख रहा है। एक वह राष्ट्रीय पार्टी है, दूसरे संकट में होने की वजह से वह प्रशांत किशोर को बड़ी भूमिका देने में संकोच नहीं करेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

%d bloggers like this: