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भारत बनेगा डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का हब! जल्द दिखने लगेंगे क्रांतिकारी सुधारों के नतीजे

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राजनाथ सिंह
किसी बड़े सुधार को शुरू करने और उसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए चट्टानी दृढ़ता और साहस की जरूरत होती है। स्टेकहोल्डर्स की प्रतिस्पर्धी आकांक्षाओं को पूरा करते हुए यथास्थिति को बदलने में बारीक संतुलन की जरूरत होती है। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल मार्गदर्शन में हमारी सरकार कभी कड़े फैसले लेने से नहीं हिचकती। सरकार ने देश के दीर्घकालिक हितों के मद्देनजर सुधार किए हैं।

डिफेंस सेक्टर को ताकत
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भारत की डिफेंस प्रोडक्शन पॉलिसी की आधारशिला रही है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ के हालिया आह्वान ने इस लक्ष्य की अनुभूति को और स्पष्ट किया है। इंडियन डिफेंस इंडस्ट्री मुख्य तौर पर आर्म्ड फोर्सेज की जरूरतों तक सीमित रही है। हाल के दिनों में एक्सपोर्ट के मोर्चे पर मिली कामयाबी से भारत अब डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर उभरने की अपनी क्षमताओं को पहचानने के लिए तैयार होता दिख रहा है। हमारा लक्ष्य डिफेंस सेक्टर में भारत को दुनिया के शीर्ष देशों में पहुंचाना है।

2014 के बाद से ही सरकार ने डिफेंस से जुड़े कई सुधार किए हैं ताकि एक्सपोर्ट और एफडीआई के लिए उपयुक्त इकोसिस्टम तैयार हो और स्वदेशी प्रोडक्ट्स की मांग को तेजी मिले। रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाले ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB) को 100 प्रतिशत सरकारी स्वामित्व वाली 7 नई कॉर्पोरेट कंपनियों में तब्दील करने का फैसला ऐतिहासिक है। इसका उद्देश्य स्वायत्तता, कुशलता, इनोवेशन और ग्रोथ को ताकत देना है।

ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों का 200 सालों से ज्यादा का गौरवशाली इतिहास रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा में उनका बड़ा योगदान है। उनके इन्फ्रास्ट्रक्चर और कुशल मानव संसाधन देश के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक पूंजी है। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में आर्म्ड फोर्सेज OFB प्रोडक्ट्स की ऊंची कीमतों, गुणवत्ता में निरंतरता का अभाव और सप्लाई में देरी पर चिंता जाहिर कर चुके हैं।

ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB) के मौजूदा सिस्टम में तमाम खामियां थीं। ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों में हर चीज बनेगी, इस सोच का नतीजा यह हुआ कि सप्लाई चेन सिकुड़ गई। प्रतिस्पर्धी बनने और बाजार में नए अवसरों, नई संभावनाओं की तलाश करने की भावना में कमी आई। एक ही छत के नीचे ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड के तहत उत्पादों की बड़ी रेंज से विशेषज्ञता में कमी आई।

7 नई कंपनियां

ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड को 7 नई कॉर्पोरेट संस्थाओं में तब्दील करने का फैसला बिजनस गवर्नेंस मॉडल के अनुरूप है। नया ढांचा इन कंपनियों को प्रतिस्पर्धी बनने की प्रेरणा देगा। संसाधनों के अधिकाधिक इस्तेमाल के जरिए ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियां उर्बर व फायदे वाली पूंजी बनेंगी। प्रोडक्ट रेंज में विशेषज्ञता की छाप गहरी होगी, गुणवत्ता और किफायती उत्पादन से प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ेगी और इनोवेशन के नए युग और डिजाइन थिंकिंग से तालमेल हो सकेगी।

महत्वपूर्ण बात यह है कि इस फैसले को लागू करते हुए सरकार ने भरोसा दिया है कि कर्मचारियों के हितों की रक्षा होगी। ये 7 नई कंपनियां अपना काम भी शुरू कर चुकी हैं। म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड का मुख्य काम अलग-अलग क्षमताओं के गोले बारूद और विस्फोटक बनाना है। इसके पास न सिर्फ ‘मेक इन इंडिया’ बल्कि ‘दुनिया के लिए निर्माण’ के जरिए आगे बढ़ने की अपार संभावनाएं हैं।

बख्तरबंद गाड़ियों की कंपनी AVANI का काम टैंक, ऐंटी-माइन वीइकल्स जैसे युद्धक वाहनों का निर्माण करना है। उम्मीद है कि अपनी क्षमताओं के बेहतर इस्तेमाल के जरिए घरेलू बाजार में इसकी हिस्सेदारी बढ़ेगी और नए एक्सपोर्ट मार्केट्स के द्वार भी खुल सकते हैं।

अडवांस्ड वीपंस ऐंड इक्विपमेंट (AWE इंडिया) का मुख्य काम तोपों, बंदूकों और दूसरे वीपन सिस्टम्स का उत्पादन है। उम्मीद है कि घरेलू मांग की पूर्ति के साथ-साथ प्रोडक्ट्स में विविधता के जरिए डोमेस्टिक मार्केट में इसकी हिस्सेदारी बढ़ेगी। बाकी 4 कंपनियों के भी ऐसे ही लक्ष्य हैं।

सरकार ने यह भी आश्वस्त किया है कि इन नई कंपनियों में से ज्यादातर के पास पर्याप्त काम हो। ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड के लंबित ऑर्डर्स को इन कंपनियों के लिए 65 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा मूल्य के कॉन्ट्रैक्ट्स में तब्दील किया गया है।

ऊंची उड़ान
शुरुआत हो चुकी है। इससे पहले तक ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों को सिर्फ आर्म्ड फोर्सेज की जरूरतों की पूर्ति का निर्देश था लेकिन नई कंपनियां इससे इतर भी संभावनाएं देखेंगी और भारत के साथ-साथ विदेश में भी नए अवसरों की तलाश करेंगी। कामकाज के साथ-साथ वित्तीय स्वायत्तता में इजाफे से ये नई कंपनियां आधुनिक बिजनस मॉडल और समन्वय को विकसित कर सकेंगी।

ये नई कंपनियों के साथ-साथ पब्लिक सेक्टर की मौजूदा कंपनियां प्राइवेट सेक्टर के साथ कदम से कदम मिलाकर देश में एक मजबूत मिलिट्री इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम का निर्माण करेंगी। इससे हमें आयात को कम से कम करने और स्वदेशी क्षमताओं के विकास की प्लानिंग में मदद मिलेगी। अगर यह कामयाब हुईं तो हमारी अर्थव्यवस्था निवेश को तो आकर्षित करेगी ही, नए रोजगार के नए मौके भी पैदा होंगे।

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